जबलपुर के पास सिहोरा… और ये कहानी किसी फिल्मी डकैती की नहीं, बल्कि हकीकत की है। 18 दिन बीत चुके हैं। 11 अगस्त को हुई डकैती की तारीख अब कैलेंडर में पीछे छूट रही है, लेकिन पुलिस की फाइल में यह केस अब भी सामने पड़ा हुआ है।
15 करोड़ का सोना और 5 लाख की नगदी..सब कुछ गायब है। डकैत गायब हैं। और पुलिस? पुलिस अब भी वही बयान दोहरा रही है – “जांच जारी है, टीमें सक्रिय हैं।”
डकैती का मास्टरमाइंड पाटन का रईस लोधी, उसके साथियों सोनू बर्मन, हेमराज सिंह और विकास चक्रवर्ती को पुलिस ने गिरफ्तार जरूर कर लिया। पर सवाल यह है कि असली डकैत, जो सोना ले गए… वो कहां हैं? और वो सोना कहां है? पुलिस की 5 टीमें यूपी, बिहार और अब झारखंड तक घूम आईं, लेकिन लौटकर आईं तो बस खाली हाथ।
डकैती की ये वारदात खितौला स्थित इसाफ स्मॉल फाइनेंस बैंक में हुई थी। नकाबपोश बदमाश सुबह 9:15 बजे बैंक में दाखिल हुए और बंदूक की नोक पर करोड़ों का माल समेट कर चलते बने। बाद में खुलासा हुआ कि ये डकैत बैंक से चंद कदम दूर बस्ती में किराए के मकान में 5 दिन से रह रहे थे। मकान मालिक को यह पता भी नहीं था कि उसके किरायेदार इतिहास में जगह बनाने जा रहे हैं।
सवाल उठता है—
अगर पुलिस डकैतों तक 18 दिन में नहीं पहुँच पाई, तो आगे क्या करेगी?
जब 5 दिन तक बदमाश बैंक के पास डेरा डाले बैठे रहे, तब खुफिया तंत्र कहाँ सो रहा था?
और सबसे अहम 15 करोड़ का सोना… कहीं ये केस भी धीरे-धीरे ठंडा न पड़ जाए?
पुलिस के बयान अब भी वही हैं, जांच वही है, और जनता का भरोसा वही टूट रहा है।
डकैती की यह कहानी हमें सिर्फ यह नहीं बताती कि बदमाश कितने चालाक हैं, बल्कि यह भी कि हमारी पुलिस कितनी लाचार है।