कॉमन सिविल कोड पर सुप्रीम कोर्ट ने गोवा की दी मिसाल, समझिए देश में यहांं कानून लागू कैसे? - sach ki dunia

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Saturday, September 14, 2019

कॉमन सिविल कोड पर सुप्रीम कोर्ट ने गोवा की दी मिसाल, समझिए देश में यहांं कानून लागू कैसे?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि देश में समान नागरिक संहिता लागू करने के लिए अब तक कोई प्रयास नहीं किया गया। जस्टिस दीपक गुप्ता और जस्टिस अनिरुद्ध बोस की पीठ ने एक मामले के फैसले में ये टिप्पणी की। शीर्ष अदालत ने कहा, देश में गोवा इसका शानदार उदाहरण है, जहां धर्म से परे जाकर समान नागरिक संहिता लागू है। यह तब है जब शीर्ष अदालत ने ही तीन मामलों में साफ तौर पर इसकी हिमायत की थी।जस्टिस दीपक गुप्ता ने कहा, गोवा एकमात्र ऐसा राज्य है जहां कुछ सीमित अधिकारों के संरक्षण को छोड़कर समान नागरिक संहिता सभी नागरिकों पर लागू होता है। संविधान निर्माताओं ने राज्य के नीति निर्देशक तत्वों पर विचार करते हुए अनुच्छेद-44 के जरिए यह आशा और उम्मीद जताई थी कि राज्य, सभी नागरिकों के लिए पूरे भारत वर्ष में समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करें। हालांकि, अब तक इस बारे में कोई कदम नहीं उठाया गया।

हिंदू कानून तो 1956 में वजूद में आया, लेकिन देश के सभी नागरिकों पर समान नागरिक संहिता लागू करने के लिए कोई प्रयास नहीं किया गया। पीठ ने यह भी कहा, 1985 में मोहम्मद अहमद खान बनाम शाह बानो मामला, 1995 में सरला मुद्गल व अन्य बनाम भारत सरकार मामला और 2003 में जॉन वेल्लामैटम बनाम भारत संघ के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने समान नागरिक संहिता की हिमायत की थी, लेकिन अब तक इसे लेकर कोई प्रयास नहीं किया गया।

शीर्ष अदालत ने ये टिप्पणी गोवा से बाहर रहने वाले गोवा के निवासियों की संपत्तियों के उत्तराधिकार विवाद के एक मामले का निपटारा करते हुए की। पीठ जोस पाउलो कौटिन्हो बनाम मारिया लिजा वैलींटना परेरा के मामले की सुनवाई कर रही थी।

गोवा में मौखिक तलाक का प्रावधान नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में इस बात का भी जिक्र किया है कि गोवा में शादी का पंजीकरण करने वाले मुस्लिम व्यक्ति को बहुविवाह नहीं कर सकता। यहां तक कि इस्लाम मानने वालों के लिए वहां पर पहले से ही मौखिक तलाक का प्रावधान नहीं है।

विधि आयोग ने कहा था, अभी सही वक्त नहीं

समान नागरिक संहिता का मसला भाजपा के एजेंडे में है। भाजपा की अगुवाई वाली केंद्र की राजग सरकार ने इसके लिए प्रयास भी किया था। कानून मंत्रालय ने 2016 में इस बारे में विधि आयोग से राय भी मांगी थी। हालांकि, एक सितंबर, 2018 को विधि आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि अभी इसके लिए सही समय नहीं आया है। विधि आयोग ने कहा था कि फिलहाल इसकी जरूरत नहीं है। आयोग ने हिंदू, मुस्लिम व ईसाई पर्सनल लॉ में संशोधन कर महिलाओं के साथ भेदभाव मिटाने की बात कही थी।

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