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अब तक तीन मंत्रियों और 11 विधायकों का इस्तीफा

चुनाव नजदीक आते ही उत्तर प्रदेश में सियासी भगदड़ मची हुई है। इसका सबसे ज्यादा असर भारतीय जनता पार्टी में देखने को मिल रहा है। अब तक भाजपा के तीन मंत्री और 11 विधायक इस्तीफा दे चुके हैं।
भाजपा से इस्तीफा देने वाले विधायकों का आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है। खबर लिखे जाने तक कैबिनेट मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य, दारा सिंह चौहान और धर्म सिंह सैनी समेत 14 विधायक इस्तीफा दे चुके हैं। आने वाले दिनों में ये संख्या और अधिक बढ़ने की उम्मीद है।

हमने अब तक भाजपा से इस्तीफा देने वाले सभी 14 नेताओं के राजनीतिक कॅरियर का विश्लेषण किया। मालूम हुआ कि इनमें से एक को छोड़कर सारे विधायक 2017 चुनाव से पहले ही भाजपा से जुड़े थे। मतलब ये नेता भाजपा काडर के नहीं माने जाते थे। ज्यादातर नेता हर बार दल बदलकर चुनाव जीतते रहे हैं।

1. स्वामी प्रसाद मौर्य : योगी कैबिनेट में श्रम मंत्री रहे स्वामी प्रसाद मौर्य ने भाजपा छोड़ दी। वे 3 बार पडरौना सीट से विधायक रहे। 2007 और फिर 2012 में 2 बार बसपा से विधायक रहे। 2017 चुनाव से ठीक पहले भाजपा में शामिल हो गए। यहां से उन्हें टिकट मिला और जीत हासिल की। मौर्य के बेटे को भी भाजपा ने टिकट दिया था, लेकिन वह हार गए। बेटी भी भाजपा के टिकट पर 2019 में सांसद चुनी गई।

2. दारा सिंह चौहान: दारा सिंह चौहान पहली बार 1996 में राज्यसभा सांसद चुने गए थे। इसके बाद 2009 से 2014 तक बसपा के टिकट पर मऊ की घोसी लोकसभा सीट से सांसद रहे। 2014 में भी बसपा से ही चुनाव लड़े थे, लेकिन हार गए। तब भाजपा प्रत्याशी हरिनारायण राजभर ने चौहान को 1.45 लाख वोटों से हराया था। 2017 चुनाव से पहले दारा सिंह ने भाजपा का दामन थाम लिया। पार्टी ने उन्हें पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ का राष्ट्रीय अध्यक्ष भी बना दिया। 2017 विधानसभा चुनाव मधुबन सीट से भाजपा के टिकट पर लड़े और जीत हासिल की। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कैबिनेट में इन्हें वन, पर्यावरण मंत्री भी बनाया गया।

3. धर्म सिंह सैनी : 2012 में धर्म सिंह सैनी ने बसपा के टिकट पर चुनाव लड़कर जीत हासिल की थी। 2017 चुनाव से ठीक पहले वह भाजपा में शामिल हो गए और फिर जीत गए। योगी सरकार में उन्हें मंत्री बनाया गया। अब उन्होंने इस्तीफा दे दिया है।

4. राधा कृष्ण शर्मा : पंडित आरके शर्मा ने 2007 में बसपा के टिकट पर बरेली की आंवला सीट से विधानसभा चुनाव लड़ा और पहली ही बार में विधायक बन गए। इसके बाद 2012 में उन्होंने चुनाव नहीं लड़ा। फिर 2017 में बदायूं की बिल्सी विधानसभा सीट पर भाजपा से टिकट लेकर उन्होंने दांव खेला और फिर जीत गए।
5. राकेश राठौर : राकेश राठौर व्यापारी थे। 2007 के विधानसभा चुनाव में BSP के टिकट पर सदर सीट से चुनाव लड़े थे, लेकिन राजनैतिक करियर में अच्छी पैठ न होने के चलते चुनाव हार गए। कुछ सालों तक राजनीतिक गलियारों में पैठ बनाई। इसके बाद वह गतवर्ष हुए विधानसभा चुनाव में BJP के टिकट पर सीतापुर की सदर सीट से चुनाव लड़े। इसमें उनको जीत हासिल हुई। राकेश राठौर शुरूआती दिनों में ही तालमेल ठीक न होने के कारण सरकार को कोसने लगे।

6. माधुरी वर्मा : बहराइच जिले की नानपारा विधानसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी की विधायक माधुरी वर्मा ने समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया है। माधुरी वर्मा की छवि दलबदलू नेत्री की रही है। वह 2010 से 2012 तक पहली बार बहराइच श्रावस्ती क्षेत्र से बसपा समर्थित उम्मीदवार के रूप में विधानपरिषद सदस्य निर्वाचित हुई थीं। माधुरी वर्मा 2012 में कांग्रेस के टिकट पर नानपारा सीट से विधानसभा सदस्य निर्वाचित हुईं थीं। फिर 2017 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने कांग्रेस छोड़ भाजपा का दामन थामा और लगातार दूसरी बार नानपारा सीट से विधानसभा पहुंचीं। माधुरी वर्मा के पति और पूर्व विधायक दिलीप वर्मा की बीते साल मई में 14 साल बाद समाजवादी पार्टी में वापसी हुई थी।

7. दिग्विजय नारायण चौबे उर्फ जय चौबे: 2012 में संतकबीर नगर के खलीलाबाद से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़े थे। 2017 में फिर से चुनाव लड़े और जीत गए। अब भाजपा छोड़कर सपा में शामिल हो गए हैं।

8. भगवती सागर : कानपुर देहात के गोपालपुर के रहने वाले भगवती प्रसाद सागर की राजनीतिक यात्रा बामसेफ से शुरू हुई। वर्ष 1993 में वह बसपा के टिकट पर भोगनीपुर से चुनाव लड़कर विधायक बने। वर्ष 1996 में उन्होने क्षेत्र बदल दिया। बिल्हौर में बसपा के टिकट पर उन्होने सपा के शिवकुमार बेरिया को हराया। प्रदेश में बसपा की सरकार बनी तो वह राज्यमंत्री बने। वर्ष 2002 में भी उन्होंने बिल्हौर से किस्मत आजमाई लेकिन शिवकुमार बेरिया से चुनाव हार गए। अगली बार 2007 में उन्होंने झांसी की मऊरानीपुर सीट को चुना तो किस्मत ने भी साथ दिया और वह विधायक बन गए। मायावती की सरकार में वह फिर से राज्यमंत्री बने। 2012 में उन्होंने बसपा छोड़कर खुद को राजनीति से दूर कर लिया और योग गुरु से जुड़ गए। हालांकि यह स्थिति सिर्फ एक चुनावी सत्र ही रही। 1996 में वह बिल्हौर से जीत चुके थे और भाजपा को बिल्हौर में अपनी जीत का खाता खोलना था। इसके लिए वह और भाजपा एकदूसरे के करीब आए। 2017 में वह भाजपा के टिकट पर बिल्हौर से लड़े और फिर से विधायक बने।

9. बृजेश प्रजापति : बृजेश प्रजापति ने बसपा से आकर भाजपा का दामन थामा था। बृजेश बसपा सरकार में राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग सदस्य के पद पर रहे। 2012 में चुनाव प्रभारी व विधानसभा तिंदवारी से बसपा प्रत्याशी रहे। बसपा ने बाद में टिकट काट दिया। इसके बाद कद्दावर नेता स्वामी प्रसाद मौर्य के साथ इन्होंने 2017 में भाजपा का दामन थामा और मोदी लहर में विधायक बने।

10. रोशन लाल वर्मा : शाहजहांपुर के तिलहर से विधायक रोशन लाल वर्मा सबसे पहले 2007 में बसपा से विधायक रहे। 2012 के चुनाव में भी बसपा से विधायक बने। 2016 में बसपा से निष्कासन के बाद भाजपा का दामन थाम लिया। 2017 के चुनाव में भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा था और जीत गए। अब सपा में शामिल हो गए।

11. विनय शाक्य : औरैया के बिधूना से विधायक विनय शाक्य 2007 और 2012 में बसपा के टिकट पर चुनाव लड़े थे। 2017 से पहले इन्होंने पाला बदल लिया और भाजपा के साथ जुड़ गए।

12. अवतार सिंह भड़ाना : हरियाणा में फरीदाबाद के रहने वाले अवतार सिंह भड़ाना 64 साल के हैं। इनका राजनीतिक सफर लंबा है। कांग्रेस के टिकट वह फरीदाबाद से तीन बार और मेरठ से एक बार सांसद रहे चुके हैं। 2017 में भाजपा से मुजफ्फरनगर की मीरापुर विधानसभा सीट पर उन्होंने भाजपा के टिकट पर विधानसभा का चुनाव लड़ा और बहुत कम वोटों से वह चुनाव जीत सके। भाजपा के विधायक रहते हुए अवतार भड़ाना ने 2019 के लोकसभा चुनाव में हरियाणा की फरीदाबाद सीट से कांग्रेस के सिंबल पर लोकसभा का चुनाव लड़ा और मौजूदा केंद्रीय राज्य मंत्री कृष्णपाल गुर्जर से रिकार्ड मतों से हार गए।

13. मुकेश वर्मा : 2012 में बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर मुकेश वर्मा ने चुनाव लड़ा था और हार गए। 2017 चुनाव से पहले वह भाजपा में शामिल हो गए। शिकोहाबाद से भाजपा के टिकट पर चुनाव जीते। अब उन्होंने इस्तीफा दे दिया है।

14. बाला प्रसाद अवस्थी : 2007 में बसपा के टिकट पर लखीमपुर खीरी से चुनाव लड़ने वाले बाला प्रसाद अवस्थी ने एक बार फिर दल बदल लिया है। 2017 चुनाव से पहले वह भाजपा में शामिल हुए थे। अब वह सपा में शामिल हो गए हैं।

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