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Sunday, March 12, 2017

यूपी में कामयाब नहीं हो पाई पीके की स्ट्रेटजी

चुनावों में कांग्रेस के प्रोफेशनल मैनेजर की स्ट्रेटजी यूपी में बुरी तरह फेल रही। एक लाइन में कहा जाए तो उन्होंने कांग्रेस को खाट से उठाकर साइकिल में तो बिठाया लेकिन चुनावी पहिया उल्टा घूम गया। तीन राज्यों के नतीजों को लेकर प्रशांत किशोर कुछ भी कहने को तैयार नहीं हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जीत में भूमिका निभाने वाले पीके कांग्रेस को वो मुकाम नहीं दिला सके जिसकी अपेक्षा कांग्रेस पार्टी उनसे कर रही होगी। पार्टी में वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी के बावजूद राहुल गांधी ने उन पर पूरा भरोसा किया। प्रशांत को पहले यूपी का जिम्मा दिया गया था लेकिन उनके कामकाज से प्रभावित होकर पंजाब और उत्तराखंड भी सौंप दिया गया। 
नतीजों की दृष्टि से पंजाब में ही पार्टी को सफलता मिली है। पंजाब में मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार कैप्टन अमरिंदर सिंह जीत का क्रेडिट कतई प्रशांत की टीम को नहीं देंगे। चुनाव के शुरूआत में कैप्टन ने प्रशांत के हिसाब से तय कार्यक्रमों से इनकार भी कर दिया था। कैप्टन किसी भी कीमत पर हस्तक्षेप नहीं चाहते थे। हालांकि बाद में राहुल के हस्तक्षेप के बाद कैप्टन तैयार हुए। 

पंजाब में प्रशांत का गणित बैठा सही

पंजाब के दलितों के बीच टीम पीके की ओर से तय किए गए सम्मेलनों आदि से नतीजे फायदेमंद रहे। पंजाब के कांग्रेस नेताओं की मानें तो टीम प्रशांत ने जीत का जो गणित बताया था सही बैठा है। जबकि उत्तराखंड में 34 विधायकों का जो आंकड़ा दिया गया था वो बुरी तरह पिटा है। पीके को उत्तराखंड का जिम्मा बहुत देर से मिला बावजूद चुनावी मैनेजमेंट में उनका लाभ दिखाई भी दिया।
यूपी को लेकर प्रशांत किशोर ने एक साथ कई यात्राओं का जो तानाबाना बुना था उससे कांग्रेस को गांवों में अपने ठंडे पड़े संगठन और कैडर खड़ा करने में कामयाब भी रही। राहुल की यात्राओं के दौरान उमड़ने वाली भीड़ और खाट सभाएं लोगों को सभा स्थल तक खींच कर भी लाईं। जिस समय कांग्रेस नेता इस एक्सरसाइज से खुश थे अंदरखाने प्रशांत किशोर की रिपोर्ट इससे इतर थी। 
पीके ने राहुल को बता दिया था कि अकेले दम कांग्रेस चुनाव में खुद को बेहतर ढंग से नहीं पेश कर पाएगी। लिहाजा समाजवादी पार्टी से हुई बातचीत का जिम्मा भी राहुल ने उन्हें ही सौंपा था। जिसे पीके ने प्रियंका गांधी को आगे बढ़ाकर सफल कराया। हालांकि इस प्रयोग का नुकसान हुआ। नतीजे बताते हैं कि दोनों पार्टियां अपने-अपने कार्यकर्ताओं के बीच गठबंधन नहीं करा सकी।

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