26 सितंबर 2026
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MP High Court: 430 दिन फाइलों में उलझी रही चुनौती, कोर्ट ने नहीं माफ की देरी; लोकायुक्त को लगा झटका

मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने भ्रष्टाचार के एक मामले में दो आरोपियों को बरी किए जाने के खिलाफ लोकायुक्त की ओर से 430 दिन की देरी से दायर चुनौती को स्वीकार नहीं किया। जस्टिस संजीव कलगांवकर की एकलपीठ ने विभागीय पत्राचार और फाइलों के अलग-अलग अधिकारियों व विभागों के बीच घूमने को इतनी लंबी देरी का पर्याप्त कारण नहीं माना। मामला रीवा के तत्कालीन ब्लॉक शिक्षा अधिकारी आनंद प्रकाश सिंह तिवारी और सहायक ग्रेड-3 विनय श्रीवास्तव से जुड़ा है।

MP High Court: 430 दिन फाइलों में उलझी रही चुनौती, कोर्ट ने नहीं माफ की देरी; लोकायुक्त को लगा झटका

जबलपुर। मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने सरकारी कामकाज में होने वाली लेटलतीफी और प्रशासनिक शिथिलता को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए लोकायुक्त की ओर से दायर चुनौती को खारिज कर दिया। भ्रष्टाचार के एक मामले में दो आरोपियों को बरी किए जाने के फैसले को चुनौती देने में 430 दिन की देरी हुई थी।

जस्टिस संजीव कलगांवकर की एकलपीठ ने देरी माफ करने के लिए पेश आवेदन को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने माना कि सरकारी विभागों के बीच फाइल का घूमते रहना और प्रशासनिक प्रक्रिया में समय लगना इतनी लंबी देरी के लिए पर्याप्त आधार नहीं हो सकता।

430 दिन की देरी बनी बड़ी वजह
विशेष अदालत के फैसले को चुनौती देने की प्रक्रिया विभागीय पत्राचार और अनुमतियों में उलझी रही। निर्धारित समय निकलने के बाद मामला हाई कोर्ट पहुंचा तो देरी माफ करने के लिए अलग से आवेदन देना पड़ा।

फाइल घूमती रही, लेकिन कोर्ट ने नहीं माना पर्याप्त कारण

लोकायुक्त की ओर से देरी का कारण विभागीय प्रक्रिया, कानूनी राय और अलग-अलग स्तरों पर जरूरी अनुमति लेने में लगा समय बताया गया। लेकिन हाई कोर्ट इस स्पष्टीकरण से संतुष्ट नहीं हुआ।

अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी फाइल का एक अधिकारी या विभाग से दूसरे अधिकारी और विभाग तक पहुंचते रहना अपने आप में देरी का संतोषजनक कारण नहीं माना जा सकता। सरकारी तंत्र को भी न्यायिक समय-सीमा का पालन करना आवश्यक है।

हाई कोर्ट का संदेश
प्रशासनिक सुस्ती के सहारे अनिश्चितकाल तक नहीं टाली जा सकती कानूनी समय-सीमा

रीवा के भ्रष्टाचार मामले से जुड़ा है पूरा प्रकरण

यह मामला रीवा जिले से जुड़ा है। तत्कालीन ब्लॉक शिक्षा अधिकारी आनंद प्रकाश सिंह तिवारी और सहायक ग्रेड-3 कर्मचारी विनय श्रीवास्तव के खिलाफ लोकायुक्त पुलिस ने भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत मामला दर्ज किया था।

विशेष न्यायालय में मामले की सुनवाई के बाद दोनों आरोपियों को आरोपों से दोषमुक्त करते हुए बरी कर दिया गया था। इसके बाद लोकायुक्त संगठन ने इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती देने की प्रक्रिया शुरू की।

अनुमति और पत्राचार में निकल गए 430 दिन

विशेष अदालत के फैसले को चुनौती देने के लिए विभागीय स्तर पर अनुमति और कानूनी प्रक्रिया पूरी की जानी थी। इसी दौरान फाइल अलग-अलग अधिकारियों और विभागों के बीच चलती रही और निर्धारित समय-सीमा निकल गई।

आखिरकार जब मामला हाई कोर्ट पहुंचा तो 430 दिन की देरी हो चुकी थी। लोकायुक्त की ओर से इस विलंब को माफ करने का अनुरोध किया गया, लेकिन अदालत ने देरी के लिए पेश कारणों को पर्याप्त नहीं माना।

लोकायुक्त की दलील
विभागीय प्रक्रिया, विभिन्न स्तरों पर पत्राचार, कानूनी परामर्श और अनुमति लेने में समय लगने के कारण निर्धारित अवधि में चुनौती पेश नहीं की जा सकी।

‘कानून की समय-सीमा सरकारी एजेंसी पर भी लागू’

अदालत ने अपने आदेश में इस बात पर जोर दिया कि सरकारी एजेंसी होने मात्र से किसी संस्था को लंबी देरी के लिए स्वतः छूट नहीं मिल सकती। देरी माफ कराने के लिए ठोस और संतोषजनक कारण सामने रखना आवश्यक है।

अदालत ने यह भी माना कि निचली अदालत से बरी हो चुके व्यक्ति को केवल सरकारी तंत्र की आंतरिक प्रक्रिया और सुस्ती के कारण लंबे समय तक कानूनी अनिश्चितता में नहीं रखा जा सकता।

भ्रष्टाचार का मामला गंभीर, फिर भी समय-सीमा जरूरी

हाई कोर्ट ने माना कि मामला भ्रष्टाचार जैसे गंभीर आरोपों से जुड़ा होने के बावजूद निर्धारित कानूनी समय-सीमा का महत्व खत्म नहीं हो जाता। किसी मामले की गंभीरता अपने आप में सैकड़ों दिनों की देरी माफ करने का आधार नहीं बन सकती।

मामला एक नजर में

● मामला: भ्रष्टाचार से संबंधित प्रकरण
● स्थान: रीवा, मध्यप्रदेश
● आरोपी: आनंद प्रकाश सिंह तिवारी और विनय श्रीवास्तव
● निचली अदालत: दोनों आरोपी बरी
● हाई कोर्ट पहुंचने में देरी: 430 दिन
● फैसला: देरी माफी का आवेदन स्वीकार नहीं

देरी माफी नामंजूर, चुनौती भी नहीं टिक सकी

एकलपीठ ने अंततः 430 दिन की देरी को माफ करने से इनकार कर दिया। देरी माफी का आवेदन खारिज होने के परिणामस्वरूप विशेष अदालत के फैसले के खिलाफ लोकायुक्त की ओर से पेश चुनौती भी आगे नहीं बढ़ सकी।

हाई कोर्ट का यह आदेश सरकारी विभागों और जांच एजेंसियों के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि अदालत ने साफ संकेत दिया है कि फाइलों की धीमी प्रशासनिक प्रक्रिया को न्यायिक समय-सीमा की अनदेखी का सामान्य आधार नहीं बनाया जा सकता।

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