15 साल बाद मिला इंसाफ! हिरासत में मौत के मामले में 9 पुलिसकर्मियों को उम्रकैद
महाराष्ट्र | वाशिम जिला एवं सत्र न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला, तत्कालीन थाना प्रभारी समेत 9 दोषी
महाराष्ट्र। वाशिम जिले से न्याय व्यवस्था को मजबूत करने वाला एक ऐतिहासिक फैसला सामने आया है। करीब 15 वर्ष पुराने पुलिस हिरासत मौत मामले में जिला एवं सत्र न्यायालय ने तत्कालीन थाना प्रभारी सहित 9 पुलिसकर्मियों को दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई है। यह मामला वर्ष 2011 में रिसोड पुलिस थाने में हिरासत के दौरान बेग्या पवार की मौत से जुड़ा है।
पूछताछ के नाम पर बर्बर पिटाई, हिरासत में चली गई जान
अभियोजन के अनुसार 10 मई 2011 को चोरी के एक मामले में पूछताछ के लिए बेग्या पवार को रिसोड पुलिस थाने लाया गया था। आरोप है कि पूछताछ के दौरान पुलिसकर्मियों ने उसके साथ अमानवीय मारपीट की, जिससे उसकी मौत हो गई। घटना के बाद पूरे इलाके में आक्रोश फैल गया और निष्पक्ष जांच की मांग उठने लगी।
CID जांच में सामने आए चौंकाने वाले तथ्य
मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच सीआईडी (CID) को सौंपी गई। करीब 34 दिनों तक चली गहन जांच में पुलिसकर्मियों की संलिप्तता के ठोस सबूत मिले। इसके बाद तत्कालीन थाना प्रभारी महादेव माणिक धांडे समेत अन्य पुलिसकर्मियों के खिलाफ हत्या और एससी/एसटी एक्ट की धाराओं में मामला दर्ज किया गया।
सीआईडी की चार्जशीट अदालत में दोष सिद्ध करने का मजबूत आधार बनी।
अदालत का ऐतिहासिक फैसला
वाशिम जिला एवं सत्र न्यायालय के न्यायाधीश जयसिंह झपाटे ने सभी साक्ष्यों और गवाहों का परीक्षण करने के बाद तत्कालीन थाना प्रभारी सहित कुल 9 पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराया और उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई।
फैसले के बाद सभी दोषियों को अदालत परिसर से ही कड़ी सुरक्षा के बीच हिरासत में लेकर जेल भेज दिया गया।
15 साल बाद मिला न्याय, छलक पड़े परिजनों के आंसू
मृतक बेग्या पवार के पिता नयनु फैसल्या पवार ने बताया कि घटना वाली रात पुलिस आधी रात के बाद उनके घर पहुंची थी। पुलिसकर्मी जबरन घर में घुसे और बेटे तथा बहू के साथ मारपीट करने लगे। विरोध करने पर कहा गया कि पूछताछ करनी है और बेग्या को अपने साथ ले गए।
अगली सुबह परिवार को सूचना मिली कि पुलिस की पिटाई के कारण बेग्या की मौत हो गई है। पिता ने कहा कि 15 वर्षों के लंबे संघर्ष के बाद आखिरकार परिवार को न्याय मिला है।
फैसले का महत्व
यह फैसला पुलिस हिरासत में होने वाले अत्याचारों के खिलाफ एक मजबूत संदेश माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून से ऊपर कोई नहीं है और मानवाधिकारों का उल्लंघन करने वालों को कड़ी सजा मिलेगी।
