2021 से भी बुरा साल था 536, जब दुनिया ने कोविड 19 से भी बद्तर कुछ देखा था



दुनिया एक और विपदा में है. हम महामारी के उस दौर में पहुंच चुके हैं जहां जन्म की किलकारियों से ज्यादा मौत की चीखें सुनाई दे रही हैं. 1900 के बाद की पीढ़ी जो देख रही है उसके लिए इससे भयानक और कुछ नहीं. साल 2020 से शुरू हुआ त्रासदी का यह आलम साल बदलने के साथ और भयानक हो चला है. ऐसे में लोग कह सकते हैं कि वे जीवन के सबसे बुरे दौर का सामना कर रहे हैं... पर क्या वाकई?

असल में वैज्ञानिकों ने इस दावे को पूरी तरह से नकार दिया है कि यह धरती पर जीवन फूटने के बाद का सबसे बुरा वक्त है. तो फिर सबसे बुरा साल था कौन सा? क्या वो जब यूरोप का सामना 1346 में ब्लैक डेथ से हुआ था? जिसने यूरोप की आधी से ज्यादा आबादी का सफाया कर दिया था.... नहीं. वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि धरती ने अपना सबसे बुरा साल सदियों पहले 536 में जिया था!
डार्क एज का वो वक्त


छठवीं शताब्दी के मध्य का वो समय डार्क एज के नाम से जाना जाता है. जिसे धरती का सबसे बुरा साल भी कहते हैं. 536 से पहले और उसके बाद धरती पर किसी ने पर्यावरण, जीवन और मानवता की ऐसी हानि नहीं देखी है. हार्वर्ड के मध्यकालीन इतिहासकार और पुरातत्वविद् माइकल मैककॉर्मिक कहते हैं कि उस वक्त लोगों ने 18 महीने तक धरती से साफ आसमान नहीं देखा था. धुंध इतना ज्यादा था कि आसपास की चीजें तक दिखाई नहीं देती थीं. उपर निगाह करो तो बस घना कोहरा नजर आता था. रोशनियां दिखना बंद हो गई थी. सूरज की चमक धरती पर रहने वालों तक पहुंच ही नहीं पाती थी.



वो नजारा कुछ ऐसा था जैसे किसी अंधे का जीवन. जहां आसपास सब कुछ होता है, पर दिखाई नहीं देता. इस सा536 में विज्ञान इतना विकसित नहीं था इस मौसम में अचानक आए इस बदलाव का कारण53शोध रिपोर्ट के अनुसार जब एक ज्वालामुखी फटता है, तो यह सल्फर, बिस्मथ और अन्य पदार्थों को वायुमंडल में छोड़ता है. ये वेे पदार्थ हैं जो पहले ही वायुमंडल में मौजूद हैं और विस्फोट के बाद अचानक वातावरण में इनकी मात्रा उच्च हो जाती है. वायु में इन पदार्थों की मात्रा ज्यादा होने से धुंध जमा हो जाती है जो सूरज की रौशनी को धरती पर आने से रोक देती है. अगर वायु में इन पदार्थों की मात्रा बहुत ज्यादा है तो इसे निम्न स्तर पर आने में सालों लग जाते हैं. यानी तब तक धरती पर सूर्य की रोशनी नहीं पहुंचेगी. जिससे ग्रीन हाउस प्रभाव के साथ साथ दूसरी प्रक्रियाएं भी प्रभावित होती है. टीम ने शोध के दौरान उक्त पदार्थों को बर्फ के साथ मिलाकर देखा और 2500 साल पहले हुए मौसमी परिवर्तन का पता लगाया है. 6 में विज्ञान इतना विकसित नहीं था इस मौसम में अचानक आए इस बदलाव का कारण समझा जा सकता. वैज्ञानिक बताते हैं कि 536 में जो भी हुआ उसका असर लंबे समय तक उत्तरी गोलार्ध पर रहा था. कई सालों तक इस विषय पर कोई शोध नहीं हुआ. लेकिन 1900 के बाद के दौर में आए वैज्ञानिकों ने 536 में हुए मौसमी बदलाव पर शोध शुरू किया. यूएम जलवायु परिवर्तन संस्थान की टीम ने मैककॉर्मिक और ग्लेशियोलॉजिस्ट पॉल मेवेस्की के नेतृत्व में कुछ शोध किए हैं. जिनसे ये पता चलता है कि साल 536 में उत्तरी गोलार्ध के आइसलैंड में एक प्रलयकारी ज्वालामुखी विस्फोट हुआ था. इसके बाद धरती पर 540 और 547 में भी ऐसे ही ज्वालामुखी फटे थे. जिसका असर धरती के मौसम पर हुआ. वैज्ञानिकों को इस बात का प्रमाण आज से महज 3 साल पहले ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका से ध्रुवीय बर्फ कोर में मिला है. समझा जा सकता. वैज्ञानिक बताते हैं कि 536 में जो भी हुआ उसका असर लंबे समय तक उत्तरी गोलार्ध पर रहा था. कई सालों तक इस विषय पर कोई शोध नहीं हुआ. लेकिन 1900 के बाद के दौर में आए वैज्ञानिकों ने 536 में हुए मौसमी बदलाव पर शोध शुरू किया. यूएम जलवायु परिवर्तन संस्थान की टीम ने मैककॉर्मिक और ग्लेशियोलॉजिस्ट पॉल मेवेस्की के नेतृत्व में कुछ शोध किए हैं. जिनसे ये पता चलता है कि साल 536 में उत्तरी गोलार्ध के आइसलैंड में एक प्रलयकारी ज्वालामुखी विस्फोट हुआ था. इसके बाद धरती पर 540 और 547 में भी ऐसे ही ज्वालामुखी फटे थे. जिसका असर धरती के मौसम पर हुआ. वैज्ञानिकों को इस बात का प्रमाण आज से महज 3 साल पहले ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका से ध्रुवीय बर्फ कोर में मिला है. ल भी हजारों लोगों ने अपनी जान गंवाई थी. आज की दुनिया में हजार का आंकड़ा ज्यादा मायने नहीं रखता पर जब धरती पर मुट्ठी भर लोग जी रहे थे तब हजारों का मौन हो जाना ऐसा था, जैसे धरती खाली हो रही है. हिस्ट्री.कॉम में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार 536 ईस्वी में धरती का तापमान अचानक गिर गया. ऐसा इसलिए था क्योंकि सूरज की किरणें धरती तक पहुंच नहीं पा रही थीं. बीजान्टिन इतिहासकार प्रोकोपियो अपनी रिपोर्ट में लिखते हैं कि सूरज चमकता तो था, लेकिन उसकी तपिश का एहसास नहीं होता था. यही कारण है कि धरती ने गर्म होना बंद कर दिया था.

शोध रिपोर्ट के अनुसार जब एक ज्वालामुखी फटता है, तो यह सल्फर, बिस्मथ और अन्य पदार्थों को वायुमंडल में छोड़ता है. ये वेे पदार्थ हैं जो पहले ही वायुमंडल में मौजूद हैं और विस्फोट के बाद अचानक वातावरण में इनकी मात्रा उच्च हो जाती है. वायु में इन पदार्थों की मात्रा ज्यादा होने से धुंध जमा हो जाती है जो सूरज की रौशनी को धरती पर आने से रोक देती है. अगर वायु में इन पदार्थों की मात्रा बहुत ज्यादा है तो इसे निम्न स्तर पर आने में सालों लग जाते हैं. यानी तब तक धरती पर सूर्य की रोशनी नहीं पहुंचेगी. जिससे ग्रीन हाउस प्रभाव के साथ साथ दूसरी प्रक्रियाएं भी प्रभावित होती है. टीम ने शोध के दौरान उक्त पदार्थों को बर्फ के साथ मिलाकर देखा और 2500 साल पहले हुए मौसमी परिवर्तन का पता लगाया है.



गर्मियों में अधिकतम तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस से 2.5 डिग्री सेल्सियस रहता था. इससे आपस सर्दियों का अंदाजा लगा सकते हैं. वह पिछले 2300 वर्षों में सबसे ठंडा दशक था. इतिहासकारों का दावा है कि उस साल चीन में गर्मियों में बर्फ गिरी थी. बिना सूरज की रौशनी के फसलें खराब हो चली थीं. जानवर और इंसान भुखमरी से मर रहे थे.
आखिर क्यों ठंडी हुई धरती
536 में विज्ञान इतना विकसित नहीं था इस मौसम में अचानक आए इस बदलाव का कारण समझा जा सकता. वैज्ञानिक बताते हैं कि 536 में जो भी हुआ उसका असर लंबे समय तक उत्तरी गोलार्ध पर रहा था. कई सालों तक इस विषय पर कोई शोध नहीं हुआ. लेकिन 1900 के बाद के दौर में आए वैज्ञानिकों ने 536 में हुए मौसमी बदलाव पर शोध शुरू किया. यूएम जलवायु परिवर्तन संस्थान की टीम ने मैककॉर्मिक और ग्लेशियोलॉजिस्ट पॉल मेवेस्की के नेतृत्व में कुछ शोध किए हैं. जिनसे ये पता चलता है कि साल 536 में उत्तरी गोलार्ध के आइसलैंड में एक प्रलयकारी ज्वालामुखी विस्फोट हुआ था. इसके बाद धरती पर 540 और 547 में भी ऐसे ही ज्वालामुखी फटे थे. जिसका असर धरती के मौसम पर हुआ. वैज्ञानिकों को इस बात का प्रमाण आज से महज 3 साल पहले ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका से ध्रुवीय बर्फ कोर में मिला है.


शोध रिपोर्ट के अनुसार जब एक ज्वालामुखी फटता है, तो यह सल्फर, बिस्मथ और अन्य पदार्थों को वायुमंडल में छोड़ता है. ये वेे पदार्थ हैं जो पहले ही वायुमंडल में मौजूद हैं और विस्फोट के बाद अचानक वातावरण में इनकी मात्रा उच्च हो जाती है. वायु में इन पदार्थों की मात्रा ज्यादा होने से धुंध जमा हो जाती है जो सूरज की रौशनी को धरती पर आने से रोक देती है. अगर वायु में इन पदार्थों की मात्रा बहुत ज्यादा है तो इसे निम्न स्तर पर आने में सालों लग जाते हैं. यानी तब तक धरती पर सूर्य की रोशनी नहीं पहुंचेगी. जिससे ग्रीन हाउस प्रभाव के साथ साथ दूसरी प्रक्रियाएं भी प्रभावित होती है. टीम ने शोध के दौरान उक्त पदार्थों को बर्फ के साथ मिलाकर देखा और 2500 साल पहले हुए मौसमी परिवर्तन का पता लगाया है.







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