जबलपुर। बच्चे की कस्टडी को लेकर चल रहे एक मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर पीठ ने महत्वपूर्ण आदेश दिया है। जस्टिस दीपक खोत की एकलपीठ ने स्पष्ट किया कि नाबालिग बच्चे की गार्जियनशिप, कस्टडी या उससे मिलने के अधिकार से संबंधित प्रकरणों की सुनवाई का क्षेत्राधिकार फैमिली कोर्ट के पास है।
हाईकोर्ट ने छठे जिला न्यायाधीश, जबलपुर द्वारा 4 अगस्त 2026 को पारित आदेश को निरस्त करते हुए मामले को उसकी पूर्व स्थिति में बहाल कर दिया। साथ ही जिला न्यायाधीश, जबलपुर को निर्देश दिया कि प्रकरण को सुनवाई के लिए फैमिली कोर्ट में ट्रांसफर किया जाए।
बच्चे की कस्टडी के लिए जिला न्यायालय पहुंचा था पिता
मामला जबलपुर निवासी मोहन राय और उनकी पत्नी नेहा राय से संबंधित है। मोहन राय की ओर से बच्चे की कस्टडी और उसकी पेशी को लेकर गार्डियंस एंड वार्ड्स एक्ट, 1890 के तहत जिला न्यायालय में कार्यवाही शुरू की गई थी।
प्रकरण में गार्डियंस एंड वार्ड्स एक्ट की धारा 12 के तहत अंतरिम आवेदन भी प्रस्तुत किया गया था। इस आवेदन पर 5 अगस्त 2025 को प्रतिवादी को नोटिस जारी हुआ और उनकी ओर से जवाब प्रस्तुत किया गया।
25 मार्च को सुनवाई पूरी, फिर बदल गए संबंधित न्यायाधीश
रिकॉर्ड के मुताबिक अंतरिम आवेदन पर दोनों पक्षों की दलीलें 25 मार्च 2026 को सुनी गई थीं और मामला आदेश के लिए सुरक्षित कर लिया गया था। इसी बीच संबंधित न्यायाधीश का स्थानांतरण हो गया।
इसके बाद मामला नवपदस्थ छठे जिला न्यायाधीश के समक्ष पहुंचा। अदालत ने अंतरिम आवेदन पर नए सिरे से सुनवाई करने का निर्देश देते हुए 12 मई 2026 की तारीख तय की थी।
अदालत ने खुद उठाया क्षेत्राधिकार का सवाल
इस बीच 17 अप्रैल 2026 को अदालत ने स्वयं मामले की स्वीकार्यता और क्षेत्राधिकार का मुद्दा उठाया। खास बात यह रही कि प्रतिवादी की ओर से इस संबंध में कोई आपत्ति नहीं उठाई गई थी।
याचिकाकर्ता ने इसके बाद प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश, जबलपुर द्वारा जारी कार्य-वितरण आदेश का हवाला दिया। उनका तर्क था कि गार्डियंस एंड वार्ड्स एक्ट से जुड़े मामलों को छठे जिला न्यायाधीश को आवंटित किया गया था।
छठे जिला न्यायाधीश ने 4 अगस्त 2026 को प्रकरण की कार्यवाही बंद करते हुए आवेदक को मामला उचित फोरम के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए वापस कर दिया था। इसी आदेश को मोहन राय ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।
डेढ़ साल की कार्यवाही दोबारा शुरू होने का था सवाल
हाईकोर्ट के समक्ष याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि प्रकरण में करीब डेढ़ साल का समय लग चुका है। प्रतिवादी की उपस्थिति सुनिश्चित हो चुकी है, जवाब आ चुका है और अंतरिम आवेदन भी निर्णय के चरण तक पहुंच गया था।
ऐसी स्थिति में यदि मामले को वापस कर दिया जाता और आवेदक को फैमिली कोर्ट में नए सिरे से आवेदन दाखिल करना पड़ता तो पूरी प्रक्रिया दोबारा शुरू होने के कारण और समय लग सकता था।
फैमिली कोर्ट एक्ट की धारा 7 और 8 बनीं महत्वपूर्ण
हाईकोर्ट ने मामले में फैमिली कोर्ट्स एक्ट, 1984 की धारा 7 और 8 का परीक्षण किया। धारा 7(1) की व्याख्या के खंड (g) में किसी नाबालिग की गार्जियनशिप, कस्टडी या उससे मिलने के अधिकार से संबंधित मुकदमे और कार्यवाहियां शामिल हैं।
वहीं धारा 8 ऐसे क्षेत्रों में, जहां फैमिली कोर्ट स्थापित है, इस प्रकृति के मामलों में सामान्य सिविल कोर्ट के क्षेत्राधिकार को बाहर करती है।
गार्डियंस एंड वार्ड्स एक्ट के तहत बच्चे की कस्टडी से जुड़ा यह मामला फैमिली कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आता है। इसलिए सामान्य सिविल कोर्ट के समक्ष इसकी सुनवाई जारी नहीं रह सकती।
मामला वापस करना गलत, ट्रांसफर करना था
हाईकोर्ट के आदेश का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यहीं सामने आया। एकलपीठ ने माना कि निचली अदालत का यह निष्कर्ष सही था कि मामला फैमिली कोर्ट में सुना जाना चाहिए, लेकिन आवेदक को प्रकरण वापस करके दोबारा उचित फोरम में पेश करने के लिए कहना सही प्रक्रिया नहीं थी।
फैमिली कोर्ट्स एक्ट की धारा 8 को देखते हुए ऐसे मामले को फैमिली कोर्ट में ट्रांसफर किया जाना चाहिए था। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने निचली अदालत के आदेश में हस्तक्षेप किया।
4 अगस्त का आदेश रद्द, केस फिर बहाल
जस्टिस दीपक खोत की एकलपीठ ने छठे जिला न्यायाधीश, जबलपुर द्वारा 4 अगस्त 2026 को पारित आदेश को निरस्त कर दिया। इसके साथ ही आवेदन को उसकी पूर्व स्थिति में बहाल करने का आदेश दिया गया।
हाईकोर्ट ने जिला न्यायाधीश, जबलपुर को निर्देश दिया कि प्रकरण को फैमिली कोर्ट में ट्रांसफर किया जाए, ताकि आगे की कार्यवाही वहीं से जारी हो सके।
केस — मोहन राय बनाम नेहा राय
कोर्ट — मध्य प्रदेश हाईकोर्ट, जबलपुर
पीठ — जस्टिस दीपक खोत
प्रकरण — सिविल रिवीजन नंबर 1083/2026
हाईकोर्ट का आदेश — 22 सितंबर 2026
निचली अदालत का विवादित आदेश — 4 अगस्त 2026
निर्णय — निचली अदालत का आदेश रद्द, मामला फैमिली कोर्ट में ट्रांसफर करने के निर्देश
कस्टडी मामलों के लिए महत्वपूर्ण आदेश
हाईकोर्ट का यह आदेश प्रक्रिया की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इससे स्पष्ट होता है कि जहां फैमिली कोर्ट स्थापित है, वहां नाबालिग की गार्जियनशिप, कस्टडी या उससे मिलने के अधिकार से संबंधित कार्यवाही फैमिली कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आती है।
साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि गलत फोरम में लंबित ऐसे प्रकरण को परिस्थितियों के अनुसार वापस करके पक्षकार को पूरी प्रक्रिया नए सिरे से शुरू कराने के बजाय कानून के प्रावधानों के अनुसार संबंधित फैमिली कोर्ट में ट्रांसफर किया जाना चाहिए।



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