उत्तर प्रदेश चुनाव में गोरखपुर शहर सीट से योगी आदित्यनाथ के ख़िलाफ़ समाजवादी पार्टी ने अपने प्रत्याशी के नाम का एलान कर दिया है.
सपा की टिकट पर भाजपा के पूर्व नेता उपेन्द्र दत्त शुक्ला की पत्नी सुभावती शुक्ला चुनाव लड़ेंगी.
वहीं बहुजन समाज पार्टी ने इसी सीट से ख़्वाजा शमसुद्दीन को टिकट दिया है.
गोरखपुर से योगी आदित्यनाथ के ख़िलाफ़ भीम आर्मी के नेता चंद्रशेखर आज़ाद चुनावी मैदान में उतर चुके हैं. मंगलवार को उन्होंने गोरखपुर शहर सीट से अपना नामांकन दाख़िल किया.
हालांकि कांग्रेस की तरफ़ से इस सीट के लिए उनके उम्मीदवार की घोषणा रिपोर्ट लिखे जाने तक नहीं हुई है.
बाक़ी पार्टियों के उम्मीदवारों की सूची पर ग़ौर करें तो समाजवादी पार्टी ने ब्राह्मण को टिकट दिया, वहीं बसपा ने मुसलमान को उतारा है, चंद्रशेखर ख़ुद को दलित और पिछड़ों के नुमाइंदे के तौर पर पेश कर ही रहे हैं और योगी आदित्यनाथ पहले ही कह चुके हैं क्षत्रिय होना कोई अपराध नहीं है.
इस जातिगत गणित के आधार पर गोरखपुर शहर विधानसभा सीट की लड़ाई और दिलचस्प हो गई है.
साल 2002 का क़िस्सा
यूं तो गोरखपुर शहर की ये सीट पारंपरिक रूप से भाजपा की सीट मानी जाती है. इस सीट पर 1989 से लेकर अब तक भाजपा का क़ब्ज़ा रहा है, सिर्फ़ साल 2002 को छोड़ कर.
भाजपा के शिव प्रताप शुक्ला जो अभी राज्यसभा सांसद हैं, वो साल 1989 से 2002 तक गोरखपुर शहर से बीजेपी के विधायक थे.
लेकिन 2002 में बाज़ी बदल गई और बीजेपी के ख़िलाफ़ उस बाज़ी को बदलने वाले बाज़ीगर कोई और नहीं ख़ुद योगी आदित्यनाथ ही थे.
साल 2002 में टिकट बंटवारे के मुद्दे पर योगी आदित्यनाथ और भाजपा नेतृत्व के बीच अनबन हो गई थी.
नाराज़ योगी ने 2002 के विधानसभा चुनाव में बग़ावती तेवर दिखाते हुए भाजपा के शिव प्रताप शुक्ला के ख़िलाफ़ अखिल भारतीय हिन्दू महासभा के बैनर तले राधा मोहन दास अग्रवाल को चुनाव मैदान में उतार दिया.
राधा मोहन दास अग्रवाल पेशे से डॉक्टर थे और बाल रोग विशेषज्ञ के तौर पर शहर में उनका अच्छा नाम था.
तब गोरखपुर शहर की विधानसभा सीट को अपनी नाक का सवाल बनाकर योगी आदित्यनाथ ने राधा मोहन दास अग्रवाल के लिए जमकर चुनाव प्रचार किया और जब नतीजे आए तो राधा मोहन दास अग्रवाल जीत गए. 2002 के चुनाव में भाजपा उम्मीदवार शिव प्रताप शुक्ला तीसरे नंबर पर रहे थे.
बाद में योगी और भाजपा के रिश्ते सुधरे, लेकिन योगी आदित्यनाथ के समर्थन से 2002 से लेकर 2017 तक राधा मोहन दास अग्रवाल ही भाजपा की टिकट पर जीतते रहे और अबकी बार ख़ुद योगी आदित्यनाथ गोरखपुर शहर से पहली बार विधानसभा का चुनाव लड़ रहे हैं.
वैसे योगी आदित्यनाथ गोरखपुर लोकसभा सीट से 1998 से पाँच बार लोकसभा सांसद रह चुके हैं.
सपा की टिकट पर भाजपा के पूर्व नेता उपेन्द्र दत्त शुक्ला की पत्नी सुभावती शुक्ला चुनाव लड़ेंगी.
वहीं बहुजन समाज पार्टी ने इसी सीट से ख़्वाजा शमसुद्दीन को टिकट दिया है.
गोरखपुर से योगी आदित्यनाथ के ख़िलाफ़ भीम आर्मी के नेता चंद्रशेखर आज़ाद चुनावी मैदान में उतर चुके हैं. मंगलवार को उन्होंने गोरखपुर शहर सीट से अपना नामांकन दाख़िल किया.
हालांकि कांग्रेस की तरफ़ से इस सीट के लिए उनके उम्मीदवार की घोषणा रिपोर्ट लिखे जाने तक नहीं हुई है.
बाक़ी पार्टियों के उम्मीदवारों की सूची पर ग़ौर करें तो समाजवादी पार्टी ने ब्राह्मण को टिकट दिया, वहीं बसपा ने मुसलमान को उतारा है, चंद्रशेखर ख़ुद को दलित और पिछड़ों के नुमाइंदे के तौर पर पेश कर ही रहे हैं और योगी आदित्यनाथ पहले ही कह चुके हैं क्षत्रिय होना कोई अपराध नहीं है.
इस जातिगत गणित के आधार पर गोरखपुर शहर विधानसभा सीट की लड़ाई और दिलचस्प हो गई है.
साल 2002 का क़िस्सा
यूं तो गोरखपुर शहर की ये सीट पारंपरिक रूप से भाजपा की सीट मानी जाती है. इस सीट पर 1989 से लेकर अब तक भाजपा का क़ब्ज़ा रहा है, सिर्फ़ साल 2002 को छोड़ कर.
भाजपा के शिव प्रताप शुक्ला जो अभी राज्यसभा सांसद हैं, वो साल 1989 से 2002 तक गोरखपुर शहर से बीजेपी के विधायक थे.
लेकिन 2002 में बाज़ी बदल गई और बीजेपी के ख़िलाफ़ उस बाज़ी को बदलने वाले बाज़ीगर कोई और नहीं ख़ुद योगी आदित्यनाथ ही थे.
साल 2002 में टिकट बंटवारे के मुद्दे पर योगी आदित्यनाथ और भाजपा नेतृत्व के बीच अनबन हो गई थी.
नाराज़ योगी ने 2002 के विधानसभा चुनाव में बग़ावती तेवर दिखाते हुए भाजपा के शिव प्रताप शुक्ला के ख़िलाफ़ अखिल भारतीय हिन्दू महासभा के बैनर तले राधा मोहन दास अग्रवाल को चुनाव मैदान में उतार दिया.
राधा मोहन दास अग्रवाल पेशे से डॉक्टर थे और बाल रोग विशेषज्ञ के तौर पर शहर में उनका अच्छा नाम था.
तब गोरखपुर शहर की विधानसभा सीट को अपनी नाक का सवाल बनाकर योगी आदित्यनाथ ने राधा मोहन दास अग्रवाल के लिए जमकर चुनाव प्रचार किया और जब नतीजे आए तो राधा मोहन दास अग्रवाल जीत गए. 2002 के चुनाव में भाजपा उम्मीदवार शिव प्रताप शुक्ला तीसरे नंबर पर रहे थे.
बाद में योगी और भाजपा के रिश्ते सुधरे, लेकिन योगी आदित्यनाथ के समर्थन से 2002 से लेकर 2017 तक राधा मोहन दास अग्रवाल ही भाजपा की टिकट पर जीतते रहे और अबकी बार ख़ुद योगी आदित्यनाथ गोरखपुर शहर से पहली बार विधानसभा का चुनाव लड़ रहे हैं.
वैसे योगी आदित्यनाथ गोरखपुर लोकसभा सीट से 1998 से पाँच बार लोकसभा सांसद रह चुके हैं.