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Friday, December 22, 2017

जब श्रीजगन्नाथ भक्त के साथ चलने को तैयार हो गए, जानें सत्य कथा

एक बार श्रीचैतन्य महाप्रभु जी के निर्देश से श्रीजगदीश पण्डित प्रभु, नीलाचल गये थे। श्रीधाम पुरी में श्रीजगन्नाथ जी के दर्शन कर आप प्रेम में आप्लावित हो गए तथा वहां से लौटते समय आप श्रीजगन्नाथ जी के विरह में व्याकुल हो गए। नन्दनन्दन श्रीकृष्ण, श्री चैतन्य महाप्रभु और श्री जगन्नाथ जी एक ही तत्त्व हैं। आपके विरह की अवस्था को देखकर श्रीजगन्नाथ जी ने स्वप्न में आपको सान्त्वना देते हुए कहा की आप चिन्ता न करें, मैं स्वयं आपके साथ चलूंगा और आप मेरे श्रीविग्रह को लेकर उसकी सेवा करें। 


लेकिन श्रीजगन्नाथ जी श्रील जगदीश पण्डित के साथ कैसे जाएंगे, उसकी व्यवस्था करने के लिए भगवान ने तत्कालीन राजा को स्वप्न में श्री जगन्नाथ देव जी के नव-कलेवर के समय उनका समाधिस्थ विग्रह श्रीजगदीश पण्डित को देने के लिये निर्देश दिया। महाराज जी, श्रीजगदीश पण्डित से मिल कर अपने को भाग्यवान समझने लगे और बड़ी श्रद्धा के साथ आपको उन्होंने श्रीजगन्नाथ जी का विग्रह अर्पण कर दिया।


श्रीजगदीश पण्डित जी ने श्रीजगन्नाथ जी से कहा कि यह तो बड़ी प्रसन्नता की बात है कि आप मेरे साथ जाएंगे किन्तु आप के भारी विग्रह को किस प्रकार उठा कर ले जाऊंगा ?


श्रीजगन्नाथ जी ने कहा, "तुम चिन्ता मत करो। मैं सूखी लकड़ी के खोखले तने के समान हलका हो जाऊंगा व आप मुझे एक नए वस्त्र में बांध कर लाठी के सहारे कन्धों पर रख कर ले जाएं तथा जहां पर स्थापन की इच्छा हो, वहीं पर रखें। 


श्रीजगदीश पण्डित प्रभु एक ब्राह्मण की सहायता से श्रीमूर्ति को कन्धे पर उठा कर पुरी से चक्रदह (पश्चिम बंगाल) के अन्तर्गत गंगा के तटवर्ती इलाका यशड़ा में आ गये। वहां आकर आप गंगा में स्नान-तर्पण हेतु, ब्राह्मण व्यक्ति के कन्धों पर श्रीजगन्नाथ देव को संभाल कर गए अचानक श्रीजगन्नाथ देव जी अत्यन्त भारी हो गए। सेवक उन्हें कन्धे पर रखने को असमर्थ हो गया और उन्हें जमीन पर उतार दिया। श्रीजगदीश पण्डित जब वापिस आए तो श्रीजगन्नाथ जी का जमीन पर अवतरण देख कर समझ गए कि श्रीजगन्नाथ देव जी ने वहीं पर ही अवस्थान करने की इच्छा की है। 


चक्रदह एक ऐतिहासिक पवित्र स्थान है। पौराणिक युग में यह स्थान 'रथवर्म' नाम से प्रसिद्ध था। द्वापर के अन्त में भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र श्रीप्रद्युम्न ने एक बार शम्बरासुर का इसी स्थान पर वध किया था। उसके बाद से इसने 'प्रद्युम्न नगर' नाम से प्रसिद्धि लाभ की, परवर्तीकाल में सगर वंश के उद्धार के लिए श्रीभगीरथ जब गंगा जी को ला रहे थे तो उसी समय उक्त स्थान में उनका रथ का पहिया (चक्र) धंस गया था इसलिए यह 'प्रद्युम्न नगर' चक्रदह नाम से प्रचारित हुआ। अब यह स्थान 'चाकदह' नाम से जाना जाता है।श्रीजगन्नाथ देव जी पुरुषोत्तम धाम से यशड़ा श्रीपाट में आ गए हैं।


ये खबर जब चारों ओर प्रचारित हुई तो अनगिनत नर-नारी यशड़ा श्रीपाट में श्रीजगन्नाथ देव जी के दर्शनों के लिए आने लगे। श्रीजगन्नाथ देव जी के यशड़ा श्रीपाट में रहने के कारण श्रीजगदीश पण्डित प्रभु ने अपने घर मायापुर में न जाकर यशड़ा में ही अवस्थान करने का संकल्प लिया। श्रीजगन्नाथ का श्रीविग्रह पहले गंगा जी के किनारे एक वट वृक्ष के नीचे प्रतिष्ठित था बाद में गोयाड़ी कृष्ण नगर के राजा श्रीकृष्णचन्द्र के सहयोग से वहां पर एक मंदिर निर्मित हुआ। 


उक्त मन्दिर के जर्जर होने पर उमेश चन्द्र मजूमदार महोदय जी की सहधर्मिणी मोक्षदा दासी ने श्रीमन्दिर का पुनः संस्कार किया। मन्दिर चूड़ा-रहित व साधारण ग्रह के आकार जैसा है। श्रीमन्दिर में श्रीजगन्नाथ देव, श्रीराधा बल्लभ जी व श्री गौर गोपाल विग्रह विराजित हैं। जिस लाठी के सहयोग से श्रीजगदीश पण्डित जी पुरी से श्रीजगन्नाथ विग्रह लाए थे, वह लाठी अब भी श्रीजगन्नाथ मन्दिर में सुरक्षित है।


अखिल भारतीय श्रीचैतन्य गौड़ीय मठ के आचार्य श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज जी ने स्वरचित ग्रन्थ 'श्रीगौरपार्षद एवं गौड़ीय वैष्णवाचार्यों के संक्षिप्त चरितामृत' नामक ग्रन्थ में लिखा है कि भगवान श्रीकृष्ण की लीला में जो याज्ञिक ब्राह्मण पत्नी थी वे ही श्रीजगदीश पण्डित व श्रीहिरण्य पण्डित के रूप में श्रीचैतन्य महाप्रभु जी की लीला में आविर्भूत हुई थी। 


पाठकों की जानकारी के लिए हम बताना चाहते हैं कि चाकदह में विराजमान ये श्रीजगन्नाथ जी, जगन्नाथ पुरी के प्रसिद्ध मन्दिर से यहां पर आएं हैं। 

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