शनिश्चरी अमावस्या पर महाकाल की नगरी में उमड़ा श्रद्धा का सैलाब
शिप्रा नदी के घाटों पर पितरों का तर्पण, त्रिवेणी शनि मंदिर में विशेष पूजा और 52 कुंड पर पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान।
उज्जैन। मध्यप्रदेश की धार्मिक नगरी उज्जैन में शनिवार को सर्वपितृ अमावस्या और शनिश्चरी अमावस्या के विशेष संयोग पर श्रद्धा, परंपरा और धार्मिक मान्यताओं का अनूठा संगम देखने को मिला। पितरों की आत्मशांति के लिए श्राद्ध और तर्पण करने वाले श्रद्धालु शुक्रवार रात से ही शिप्रा नदी के विभिन्न घाटों पर पहुंचने लगे थे। सुबह होते-होते घाटों, मंदिरों और प्रमुख धार्मिक स्थलों पर श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ गई।
एक ओर शिप्रा के तट पर पितरों के निमित्त तर्पण और धार्मिक अनुष्ठान किए गए, वहीं दूसरी ओर त्रिवेणी स्थित नवग्रह शनि मंदिर में शनिदेव के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगी रहीं। कई श्रद्धालुओं ने अपनी धार्मिक मान्यता के अनुसार पुराने जूते-चप्पल और वस्त्र छोड़कर जीवन की परेशानियों से मुक्ति की कामना की।
इसी दौरान केडी पैलेस स्थित प्रसिद्ध 52 कुंड पर भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। यहां विभिन्न पारंपरिक मान्यताओं से जुड़े धार्मिक अनुष्ठान किए गए। प्रशासन ने संभावित भीड़ को देखते हुए सुरक्षा, निगरानी और स्नान की विशेष व्यवस्था की है।
- शिप्रा नदी के घाटों पर पितरों के लिए श्राद्ध और तर्पण।
- त्रिवेणी नवग्रह शनि मंदिर में शनिदेव की विशेष पूजा-अर्चना।
- पुराने जूते-चप्पल और वस्त्र छोड़ने की पारंपरिक मान्यता।
- केडी पैलेस के 52 कुंड पर श्रद्धालुओं की भीड़।
- सीसीटीवी निगरानी और स्नान के लिए विशेष फव्वारा व्यवस्था।
- शाम तक डेढ़ से दो लाख श्रद्धालुओं के पहुंचने का अनुमान।
शिप्रा घाटों पर पितरों के निमित्त श्राद्ध-तर्पण, रात से पहुंचने लगे श्रद्धालु
सर्वपितृ अमावस्या को पितृ पक्ष का महत्वपूर्ण दिन माना जाता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार इस दिन उन पितरों के निमित्त भी श्राद्ध और तर्पण किया जाता है, जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं होती या जिनका श्राद्ध निर्धारित तिथि पर नहीं हो पाया हो।
इसी मान्यता के चलते शनिवार को उज्जैन के शिप्रा घाटों पर श्रद्धालुओं की भीड़ दिखाई दी। लोगों ने विधि-विधान से जल अर्पित किया और अपने दिवंगत पूर्वजों की आत्मशांति की प्रार्थना की। कई परिवार धार्मिक अनुष्ठानों के लिए दूर-दराज के क्षेत्रों से उज्जैन पहुंचे।
घाटों पर सुबह से ही धार्मिक गतिविधियां चलती रहीं। श्रद्धालुओं ने पुरोहितों के मार्गदर्शन में तर्पण और श्राद्ध कर्म संपन्न किए।
त्रिवेणी शनि मंदिर में रात से लंबी कतारें, तेल और काली उड़द अर्पित
त्रिवेणी स्थित प्रसिद्ध नवग्रह शनि मंदिर में श्रद्धालुओं का पहुंचना शुक्रवार रात से ही शुरू हो गया था। शनिवार सुबह तक मंदिर परिसर में दर्शनार्थियों की लंबी कतारें लग गईं।
श्रद्धालुओं ने शनिदेव को तेल, काली उड़द, फूल और प्रसाद अर्पित कर पूजा-अर्चना की। धार्मिक मान्यता के अनुसार शनिवार के दिन पड़ने वाली अमावस्या को शनिदेव की आराधना के लिए विशेष महत्वपूर्ण माना जाता है।
श्रद्धालुओं की संख्या को देखते हुए मंदिर परिसर और आसपास सुरक्षा तथा आवागमन की व्यवस्था की गई। शिप्रा नदी के जल से स्नान कराने के लिए फव्वारों की सुविधा उपलब्ध कराई गई, जबकि नदी में सीधे उतरकर डुबकी लगाने पर प्रतिबंध रखा गया।
त्रिवेणी क्षेत्र में शनिश्चरी अमावस्या पर पुराने जूते-चप्पल और वस्त्र छोड़ने की परंपरा प्रचलित है। स्थानीय धार्मिक विश्वास के अनुसार ऐसा करने से शनि संबंधी परेशानियों और दुर्भाग्य से मुक्ति मिलती है। यह एक लोक-धार्मिक मान्यता है, जिसका वैज्ञानिक आधार स्थापित नहीं है।
पूजा के बाद छोड़े जूते-चप्पल और कपड़े, निभाई पुरानी परंपरा
त्रिवेणी क्षेत्र में शनिवार को कई श्रद्धालु स्नान और शनिदेव के दर्शन के बाद पुराने जूते-चप्पल तथा कपड़े छोड़ते दिखाई दिए। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह परंपरा जीवन की बाधाओं और पनौती को दूर करने की कामना से जुड़ी है।
कुछ श्रद्धालु विशेष रूप से इस परंपरा का पालन करने के लिए उज्जैन पहुंचे थे। मंदिर क्षेत्र में धार्मिक गतिविधियों के कारण सुबह से ही चहल-पहल बनी रही।
शनि मंदिर में चढ़ाए गए तेल की होगी नीलामी, रीसाइक्लिंग की व्यवस्था
शनिदेव की पूजा के दौरान श्रद्धालुओं द्वारा बड़ी मात्रा में तेल अर्पित किया जाता है। प्राप्त जानकारी के अनुसार मंदिर में चढ़ाए गए तेल की 24 घंटे बाद नीलामी करने की व्यवस्था है।
इसके बाद तेल को रीसाइकिल कर उपयोगी उत्पाद तैयार किए जाने की जानकारी दी गई है। धार्मिक अनुष्ठान के साथ संसाधनों के प्रबंधन की यह व्यवस्था भी ध्यान आकर्षित कर रही है।
केडी पैलेस के 52 कुंड पर भी उमड़ी भीड़, भूतड़ी अमावस्या की मान्यता
उज्जैन के केडी पैलेस स्थित प्रसिद्ध 52 कुंड पर भी शनिवार सुबह से श्रद्धालुओं की भीड़ दिखाई दी। यहां सूर्य कुंड और ब्रह्म कुंड में स्नान करने की पुरानी धार्मिक परंपरा है।
स्थानीय लोकविश्वास के अनुसार भूतड़ी अमावस्या पर इन कुंडों में स्नान और विशेष अनुष्ठान करने से भूत-प्रेत बाधा तथा नकारात्मक प्रभावों से मुक्ति मिलती है। इसी विश्वास के चलते बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचे।
कुछ लोग हाथों में जंजीर और तलवार लिए दिखाई दिए, जबकि कुछ श्रद्धालुओं का व्यवहार सामान्य से अलग नजर आया। ये दृश्य स्थानीय धार्मिक अनुष्ठानों और मान्यताओं से जुड़े बताए जा रहे हैं। किसी व्यक्ति के व्यवहार को अलौकिक प्रभाव का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
कुंड परिसर में श्रद्धालुओं की आवाजाही दिनभर जारी रहने की संभावना जताई गई है।
यह संभावित संख्या है, अंतिम आधिकारिक उपस्थिति का आंकड़ा नहीं।
सीसीटीवी कंट्रोल रूम से निगरानी, महिला-पुरुषों के लिए अलग स्नान व्यवस्था
श्रद्धालुओं की सुरक्षा और सुविधा को लेकर प्रशासन ने विशेष इंतजाम किए हैं। तहसीलदार मुकेश सोनी के अनुसार प्रमुख धार्मिक स्थलों की निगरानी के लिए सीसीटीवी कंट्रोल रूम स्थापित किया गया है।
महिला और पुरुष श्रद्धालुओं के स्नान के लिए अलग-अलग फव्वारा व्यवस्था की गई है, ताकि भीड़ के बीच किसी प्रकार की अव्यवस्था न हो। शिप्रा नदी में सीधे डुबकी लगाने पर प्रतिबंध लगाते हुए निर्धारित स्थानों पर स्नान की सुविधा दी गई।
तहसीलदार के मुताबिक शुक्रवार रात में ही लगभग पांच हजार श्रद्धालु उज्जैन पहुंच चुके थे। शनिवार को दिन चढ़ने के साथ भीड़ लगातार बढ़ने की संभावना जताई गई।
प्रशासन ने अनुमान लगाया है कि शाम तक करीब डेढ़ से दो लाख श्रद्धालु विभिन्न घाटों और मंदिरों में स्नान, दर्शन तथा धार्मिक अनुष्ठान के लिए पहुंच सकते हैं।
धार्मिक आस्था के साथ सुरक्षा और स्वच्छता की चुनौती
शनिश्चरी अमावस्या जैसे बड़े धार्मिक अवसरों पर उज्जैन में श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ने से भीड़ प्रबंधन, यातायात, स्वच्छता और नदी तट की सुरक्षा महत्वपूर्ण हो जाती है।
विशेष रूप से घाटों और मंदिरों के आसपास श्रद्धालुओं की आवाजाही को व्यवस्थित रखना तथा धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान सुरक्षा मानकों का पालन कराना प्रशासन के लिए आवश्यक है।
नदी में सीधे स्नान पर रोक और फव्वारों के माध्यम से स्नान की व्यवस्था को इसी सुरक्षा प्रबंधन का हिस्सा बताया गया है।
सर्वपितृ और शनिश्चरी अमावस्या के विशेष संयोग पर उज्जैन के शिप्रा घाटों, त्रिवेणी नवग्रह शनि मंदिर और केडी पैलेस के 52 कुंड पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। पितरों के निमित्त तर्पण, शनिदेव की आराधना और स्थानीय परंपराओं के बीच प्रशासन ने सुरक्षा तथा स्नान की विशेष व्यवस्था की। शाम तक डेढ़ से दो लाख श्रद्धालुओं के पहुंचने का अनुमान जताया गया है।



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