नई दिल्ली। दवा कंपनियों द्वारा डॉक्टरों को महंगे उपहार, विदेश यात्राएं, आतिथ्य और दूसरी सुविधाएं देकर अपनी दवाओं का प्रचार कराने की प्रथाओं पर अब कानूनी शिकंजा कसने की संभावना बढ़ गई है। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को केंद्र सरकार को तीन सदस्यीय समिति गठित करने का निर्देश दिया है, जो दवा कंपनियों की मार्केटिंग गतिविधियों के वैधानिक नियमन की आवश्यकता की जांच करेगी। समिति यह भी सुझाव देगी कि यदि नया कानूनी प्रावधान जरूरी है, तो उसका स्वरूप क्या होना चाहिए।
मामला दवा कंपनियों द्वारा अपने उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए डॉक्टरों को मुफ्त उपहार, महंगी यात्राएं, आतिथ्य और अन्य लाभ उपलब्ध कराने से जुड़ा है। याचिका में सवाल उठाया गया कि ऐसे लाभ स्वीकार करने वाले डॉक्टरों के खिलाफ कार्रवाई का प्रावधान होने के बावजूद लाभ देने वाली कंपनियों के लिए समान प्रभावी वैधानिक व्यवस्था क्यों नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने केंद्र को दिया निर्देश
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने दवा कंपनियों की मार्केटिंग गतिविधियों के नियमन से संबंधित याचिका पर सुनवाई की। इस दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि केंद्र सरकार तीन सदस्यीय समिति गठित करेगी।
यह समिति मौजूदा कानूनों और नियामक व्यवस्था का अध्ययन करेगी। साथ ही इस बात की समीक्षा करेगी कि दवा कंपनियों की प्रचार गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए अतिरिक्त वैधानिक व्यवस्था आवश्यक है या नहीं। जरूरत पड़ने पर समिति नए कानूनी प्रावधानों का प्रारूप भी सुझा सकती है।
डॉक्टरों पर कार्रवाई का प्रावधान, कंपनियों की जवाबदेही पर बहस
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने बताया कि वर्तमान नियामक व्यवस्था में डॉक्टरों द्वारा अनुचित लाभ स्वीकार करने पर उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की व्यवस्था है। हालांकि याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि दवा कंपनियों द्वारा इस तरह के प्रलोभन दिए जाने पर उनके खिलाफ प्रभावी कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करने की भी आवश्यकता है।
याचिका में दलील दी गई कि यदि दवाएं लिखने वाले चिकित्सकों के लिए नैतिक नियम निर्धारित हैं, तो दवा कंपनियों की प्रचार गतिविधियों में भी जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित होनी चाहिए।
समिति दवा कंपनियों की मार्केटिंग गतिविधियों, मौजूदा नियामक प्रावधानों और संभावित कानूनी सुधारों की समीक्षा करेगी। संबंधित पक्षों से प्राप्त सुझावों तथा आपत्तियों पर विचार करने के बाद केंद्र सरकार को अपनी सिफारिशें सौंपेगी।
केंद्र को हलफनामा दाखिल करने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से समिति के गठन और अपने निर्देशों के अनुपालन के संबंध में हलफनामा दाखिल करने को कहा है। मामले में अगली सुनवाई 29 जनवरी को निर्धारित की गई है। समिति की रिपोर्ट के आधार पर भविष्य में दवा कंपनियों की मार्केटिंग से जुड़े नियमों में बदलाव की संभावना पर विचार किया जा सकता है।
27 हजार की कैंसर दवा 3 हजार में सप्लाई, अदालत ने पूछा था सवाल
दवा कंपनियों की मार्केटिंग गतिविधियों का मामला ऐसे समय सामने आया है, जब सुप्रीम कोर्ट दवाओं की कीमत और मरीजों पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ से संबंधित विभिन्न याचिकाओं पर भी विचार कर रहा है।
पिछली सुनवाई के दौरान अदालत ने एक कैंसर की दवा का उदाहरण देते हुए सवाल उठाया था कि जिस दवा का अधिकतम खुदरा मूल्य यानी एमआरपी 27,000 रुपये है, उसे खुदरा विक्रेताओं को लगभग 2,700 से 3,000 रुपये में क्यों उपलब्ध कराया जा रहा है।
अदालत ने आपूर्ति मूल्य और एमआरपी के बीच भारी अंतर पर गंभीर चिंता जताई थी। सुनवाई के दौरान इस तरह के मूल्य अंतर को लेकर बेहद कड़ी टिप्पणी की गई और सवाल उठाया गया कि दवा निर्माताओं को इतनी अधिक एमआरपी निर्धारित करने की अनुमति क्यों मिलनी चाहिए।
दवाओं की कीमतों पर एक समान मार्जिन तय करने का सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया था कि क्या आवश्यक वस्तु अधिनियम के अंतर्गत आने वाले फार्मास्यूटिकल उत्पादों के लिए एक समान व्यापारिक मार्जिन निर्धारित किया जा सकता है। अदालत ने दवा मूल्य नियंत्रण आदेश के तहत आवश्यक और गैर-आवश्यक श्रेणियों में रखी गई दवाओं के मूल्य निर्धारण से संबंधित पहलुओं पर भी विचार करने की आवश्यकता जताई थी।
अदालत की चिंता यह भी थी कि जब किसी दवा की एमआरपी और उसकी वास्तविक आपूर्ति कीमत में बहुत बड़ा अंतर होता है, तो इससे उपभोक्ताओं का भरोसा प्रभावित हो सकता है। मरीजों को दवा की गुणवत्ता और वास्तविक कीमत को लेकर संदेह भी हो सकता है।
मरीजों के हित और चिकित्सा व्यवस्था की पारदर्शिता का सवाल
दवा कंपनियों की मार्केटिंग गतिविधियों के नियमन से जुड़ी बहस केवल डॉक्टरों और फार्मा कंपनियों तक सीमित नहीं है। इसका सीधा संबंध मरीजों के हित, दवाओं की वहनीयता और चिकित्सा व्यवस्था में पारदर्शिता से भी है।
यदि दवा लिखने के निर्णय पर अनुचित व्यावसायिक प्रोत्साहनों का प्रभाव पड़ता है, तो मरीजों को अनावश्यक रूप से महंगी दवाएं खरीदनी पड़ सकती हैं। हालांकि किसी विशेष चिकित्सक या कंपनी के संबंध में अनैतिक आचरण का निष्कर्ष ठोस साक्ष्यों और नियमानुसार जांच के आधार पर ही निकाला जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद दवा कंपनियों की मार्केटिंग गतिविधियों को लेकर नियामक व्यवस्था की समीक्षा का रास्ता खुला है। प्रस्तावित समिति की सिफारिशों से यह स्पष्ट हो सकेगा कि मौजूदा नियम पर्याप्त हैं या मरीजों के हितों की रक्षा और फार्मा क्षेत्र में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए नए कानूनी प्रावधानों की आवश्यकता है।



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