जूनियर डॉक्टर आत्महत्या केस: हाईकोर्ट ने 5 डॉक्टरों को नहीं दी राहत, FIR रद्द करने से इंकार

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⚖️ मेडिकल कॉलेज के 5 डॉक्टरों को हाईकोर्ट से झटका, जूनियर डॉक्टर आत्महत्या मामले में FIR रद्द करने से इंकार

📍 जबलपुर: नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल कॉलेज में जूनियर डॉक्टर की आत्महत्या के चर्चित मामले में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने 5 डॉक्टरों के खिलाफ दर्ज FIR और लंबित आपराधिक प्रकरण को निरस्त करने से साफ इंकार कर दिया है।

🚨 2020 की घटना, जूनियर डॉक्टर ने हॉस्टल में की थी आत्महत्या

अभियोजन के अनुसार भगवत देवांगन नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल कॉलेज जबलपुर में ऑर्थोपेडिक विभाग में पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई कर रहे थे। 1 अक्टूबर 2020 को उन्होंने अपने हॉस्टल के कमरे में आत्महत्या कर ली थी।

मृतक के भाई की शिकायत पर गढ़ा थाना पुलिस ने पांच सीनियर डॉक्टरों के खिलाफ धारा 306 और 34 के तहत मामला दर्ज किया था। जांच के बाद पुलिस ने चार्जशीट भी न्यायालय में प्रस्तुत की थी।



📋 जांच में सामने आए गंभीर आरोप

  • जूनियर डॉक्टर को लगातार परेशान करने के आरोप।
  • बार-बार अपमानित और प्रताड़ित किए जाने की शिकायत।
  • रैगिंग और मानसिक दबाव बनाने के आरोप।
  • क्षमता से अधिक काम कराने की बात जांच में सामने आई।
  • मृतक की मानसिक स्थिति खराब होने के बावजूद कथित उत्पीड़न जारी रहने के आरोप।

🩺 बचाव में डॉक्टरों ने क्या कहा?

याचिकाकर्ता डॉक्टरों ने कोर्ट में तर्क दिया कि मृतक पहले से ही मानसिक तनाव, डिप्रेशन और आर्थिक अस्थिरता से जूझ रहा था। उसके इलाज और दवाओं से जुड़े दस्तावेज भी प्रस्तुत किए गए।

डॉक्टरों का कहना था कि मेडिकल कॉलेज की एंटी-रैगिंग कमेटी ने पहले ही जांच कर उन्हें क्लीन चिट दे दी थी और रैगिंग का कोई मामला नहीं पाया गया था।

⚖️ हाईकोर्ट ने क्यों खारिज की याचिका?

हाईकोर्ट की एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा कि "उकसाना" केवल सीधे आत्महत्या के लिए कहने तक सीमित नहीं है। यदि किसी व्यक्ति के साथ लगातार ऐसा व्यवहार किया जाए जिससे उसके सामने कोई दूसरा रास्ता न बचे, तो वह भी उकसावे की श्रेणी में आ सकता है।

कोर्ट ने माना कि जांच में जुटाए गए साक्ष्य प्रथम दृष्टया आरोपियों के खिलाफ धारा 306 और 34 के तहत मामला बनाते हैं। इसलिए FIR और ट्रायल को इस स्तर पर समाप्त नहीं किया जा सकता।

📌 कोर्ट की अहम टिप्पणी

"संस्थागत जांच और आपराधिक जांच का दायरा अलग-अलग होता है। एंटी-रैगिंग कमेटी को कार्रवाई योग्य साक्ष्य नहीं मिले, इसका अर्थ यह नहीं कि आपराधिक जांच स्वतः समाप्त हो जाए।"

🔥 हाईकोर्ट के फैसले के बाद पांचों डॉक्टरों पर आपराधिक मुकदमा जारी रहेगा
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