कत्ल पर खंजर रुसवा...फिर मौज में कातिल हर चौथे घर मातम, हर आंगन में दहशत...।




 वरिष्ठ पत्रकार अभिषेक सोनी की कलम से- जबलपुर  सहित पूरे देश में अमूमन हालात एक जैसे हैं। लगातार मौत और अस्पतालों में दम तोड़ चुकी व्यवस्थाओं पर प्रशासन कठघरे में है...लेकिन क्यों? ये तो वही बात हो गई कि कत्ल करने वाले को छोड़कर हम खंजर से उलझ पडे...।

 लोकतांत्रिक देश में हमारे साथ ये हमेशा से होते आया है, सियासत करने वाले अपने घरों में दुबककर प्रशासन को आगे कर देते हैं, जबकि असलियत ये है कि प्रशासन पूरी तरह से सियासी-फ्रेम में ही काम करता है।  

 अस्पतालों में आॅक्सीजन, जरूरी दवाईयों सहित इंजेक्शन की कमी से गरीब और आमजन परेशान हैं, दर-दर भटक रहे हैं, पत्रकारों से मदद मांगी जा रही हैं, जबकि सच ये है कि पत्रकार खुद परेशान और लाचार हैं...।

 अब मुद्दे की बात पर आएं...वोट किसे दिया था, वादे किसने किए थे...जनता की सुरक्षा, स्वास्थ, शिक्षा और विकास के...कलेक्टर ने नहीं किए थे, अधिकारियों ने नहीं किए थे...ये तो कठपुतली हैं, इनकी डोर जिनके हाथों में उन्हें पकड़ने की जरूरत है..।

 सच बात तो यह है कि हम जिस अराजक व्यवस्था का दंश झेल रहे हैं, उसकी नींव हमारे द्वारा ही रखी गई है। लहर और आंशिक लाभ में आकर दिए अमूल्य वोट की कीमत आज हमारी मौत का सबब बनी है...। देश को राइट टू कॉल (जनप्रतिनिध के बहिष्कार करने का अधिकार) के कानून की जरूरत है, ताकि मद में चूर नेताओं का नशा उतारने का मंत्र जनता के पास रहे...। 

 हाल-फिलहाल तो यही संभव है कि हम सोशल मीडिया पर एक स्वर में लापरवाह जनप्रतिनिधियों और सरकार का विरोध दर्ज कराते रहें, यही हमारे पास एक मात्र विकल्प है...।

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