नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने दहेज की खातिर प्रताड़ना दिए जाने से संबंधित अपने जुलाई 2017 के फैसले में शुक्रवार को सुधार किया. भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए से संबंधित इस प्रकरण में कोर्ट ने कहा कि दहेज प्रताड़ना के मामलों में अग्रिम जमानत के प्रावधान को संरक्षण प्रदान किया गया है. इस तरह शीर्ष अदालत ने दहेज से जुड़े मामले में गिरफ्तारी हो या न हो, यह तय करने की जिम्मेवारी पुलिस प्रशासन को दे दी है. शीर्ष अदालत ने कहा कि इसको लेकर सभी राज्यों के पुलिस महानिदेशक पुलिस अफसरों के बीच जागरूकता फैलाएं. प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर और न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड़ की पीठ ने दो सदस्यीय पीठ के फैसले में सुधार करते हुये अपने निर्णय में कहा कि अदालतों के लिए दंड विधि में व्याप्त किसी कमी को दूर करने की सांविधानिक तरीके से कोई गुंजाइश नहीं है.

शीर्ष अदालत के दो न्यायाधीशों की पीठ ने 27 जुलाई, 2017 को अपने फैसले में कहा था कि दहेज प्रताड़ना की शिकायत पर विचार के लिए समिति गठित की जाए. इस पीठ ने धारा 498-ए के बढ़ते दुरूपयोग पर चिंता व्यक्त् करते हुए अनेक निर्देश दिये थे. इनमें यह भी शामिल था कि आरोपों की पुष्टि के बगैर सामान्यतया कोई गिरफ्तारी नहीं की जानी चाहिए क्योंकि निर्दोष व्यक्तियों के मानवाधिकारों के उल्लंघन को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है.

पीठ ने टिप्पणी की थी कि ऐसी अनेक शिकायतें सही नहीं थीं और अनावश्यक गिरफ्तारियां दाम्पत्य जीवन में समझौते की गुंजाइश खत्म कर सकती हैं. न्यायालय की इस व्यवस्था के खिलाफ अहमदनगर की महिला वकीलों के गैर सरकारी संगठन ‘न्यायाधार’ ने याचिका दायर की थी. इसमें दो न्यायाधीशों की पीठ के फैसले पर फिर से विचार करने का अनुरोध करते हुये कहा गया था कि इस न्यायिक व्यवस्था ने ससुराल में विवाहित महिला से क्रूरता के अपराध से निबटने संबंधी दहेज निरोधक कानून की सख्ती को काफी कम कर दिया है.

न्यायाधीशों की तीन सदस्यीय पीठ ने इस याचिका पर 23 अप्रैल को सुनवाई पूरी करते हुये कहा था, ‘‘महिलाओं के लिये लैंगिक न्याय होना चाहिए क्योंकि जहां एक ओर दहेज का विवाह पर बुरा असर पड़ता है वहीं दूसरी ओर व्यक्ति के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार भी है.’’

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